مشمولات

Monday, 5 September 2022

क्या शिक्षक अपने कार्य से संतुश्ट हैं?

क्या शिक्षक अपने कार्य से संतुष्ट हैं?

 

आज 5 सितम्बर है। शिक्षक दिवस। शिक्षकों के प्रति सम्मान का दिन। इस अवसर पर सभी शिक्षकों को बधाई! इस विशेष अवसर पर छात्रों ने हमें सम्मान दिया। राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपालों और जिलों के जिला मजिस्ट्रेटों ने भी शिक्षण के क्षेत्र में हमारी मूल्यवान सेवाओं को स्वीकार किया।  हम आज ही नहीं हर दिन और हर पल अपने छात्रों द्वारा सम्मान के पात्र हैं। सरकार और समाज की ओर से सम्मान के पात्र हैं। आज के दिन सम्मान को स्वीकार करते हुए हमें अपनी समीक्षा करने की आवश्यकता है कि हम अपने कार्य से कितने संतुष्ट हैं? क्या हमें संतुष्टि है कि हम पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं? सादा दिल छात्रों ने आज जिस प्रकार से हमें सम्मानित किया, वही छात्र जब इस लायक हो जाएगा कि वह अपने भले-बुरे को समझ सके और अपने पिछले दिनों की समीक्षा करे तब भी वह हमें इसी सम्मान के साथ याद करे और कहे कि वह जो कुछ है हमारे ही एहसान और प्रयासों का परिणाम है? यदि हमे यह संतुष्टि है और हमारा दिल अपने कार्यशैली पर संतुष्ट है तो इस दिवस की बधाई! बारंबार बधाई।

परंतु अगर हम आज स्वयं अपने कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं और अगर अभी हमारे सीने में दिल हम से यह कह रहा है कि हमने उस गीली मिट्टी को बिगाड़ दिया है जिसमें कुछ बनने की क्षमता थी, उस के अंदर मौजूद बल-शक्ति को हम बर्बाद कर रहे हैं और जो हम उनके साथ कर रहे हैं वही अगर हमारे साथ होता तो हम उस पर क्या करते, तो हम अपने कार्यशैली में बदलाव ले आएं क्योंकि यह भोले-भाले छात्र आज हमारा चाहे जितना सम्मान करें, जब यह बड़े होजाएंगे और इनका भविष्य तबाह हो चुका होगा तो वे हमें मुआफ नहीं करेंगे। वे हमारे सामने से गुजरेंगे हैं और उनकी नजर हमारे एहसान से झुकेगी नहीं बल्कि उनका सीना अकड़ा हुआ होगा और हमारी ओर घृणा की दृष्टि से देखेंगे। सोचिए उस समय हमारे दिल पर क्या बीतेगी। हमें यह भी बताने की आवश्यक्ता नहीं कि चीजों को बेकार छोड़देने का नुकसान केवल यह नहीं है कि वह काम में नहीं लाई गई बल्कि इसके अंदर जो बल-शक्ति मौजूद थी वह नष्ट हो गई और उस बल शक्ति से स्वयं उसके साथ मानव जीवन को जो लाभ होता एवं विश्व के विकास की गति को तेज करने में जो मदद मिलती वह भी नष्ट हो गई।

क्षमा चाहते हैं, अगर हम इस लायक नहीं है कि गीली मिट्टी को सुंदर रूप दे सकें तो अपने पेशे को छोड़ दें। कोई और काम ढूंढ लें मगर दुनिया में खराब उत्पाद कर देश और समाज के सौंदर्यबोध को नष्ट न करें।

हमारी स्थिति एक कुम्हार की है। हमारे सामने मिट्टी है। हमेंइस मिट्टी से बर्तन बनाना है तो खराब बर्तन तैयार होने से बेहतर है कि न बने। यदि हम खराब बर्तन बनाकर बाजार में उतारेंगे तो यह न बिकेंगे। यदि हमें बनाना ही है तो खराब बनाने  से बेहतर है कि अच्छा बनाएं। इससे हमारे दिल को संतोष होगा। हम अपने हाथ से बनाई हुई चीजों को देखकर खुश होंगे और हमारा दिल हमें संतुष्टि देगा। लेकिन बेहतर तब होगा जब हम चाहेंगे और जब हम में बेहतर बनाने का कौशल होगा। कौशल या हुनर कोई माँ के पेट से लेकर नहीं आता है। वह सीखता है अपने अंथक प्रयासों से। हम प्रयास करेंगे तो हुनरमन्द हो जाएंगे। और जब हुनरमन्द नहीं होंगे तो हम बेहतर नहीं बना सकते हैं।

मिट्टी भी अलग अलग प्रकार की होती है। कौन मिट्टी कितनी गीली होगी और कितनी गोदी जाएगी तो बर्तन अच्छे होंगे यह तभी पता चलेगा जब हम हुनरमन्द होंगे। बच्चे भी कच्ची मिट्टी के समान हैं जो कुछ बन्ने की क्षमता रखते हैं। उन्हें हम चाहें तो संवार दें और चाहें तो बिगाड़ दें। अगर संवार देंगे तो हमारे दिल को संतोष होगा और अपने उत्पाद पर प्रसन्न होंगे और अच्छे उत्पाद के लिए हमको ग्राहकों से अच्छा मुल्य प्राप्त होगा वहीं समाज की ओर से पुरस्कृत भी होगें।

                छात्र भी सभी प्रकार के होते हैं। अलग-अलग प्रकार के छात्र के लिए अलग-अलग प्रकार की कौशल की आवश्यक्ता है। हमें उनकी खूबियों और खामियों और उनकी क्षमताओं को पहचानना होगा तभी हम उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार ढाल सकते हैं।

मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक शिक्षक थे। बड़े ज्ञानी और दार्शनिक। वह अपने छात्रों का बहुत सम्मान करते थे। एक बार उनके मित्रों ने कहा कि भाई तुम बच्चों को इतना सम्मान क्यों देते हो? उस ने एक ठंडी सांस भरी और कहा कि तुम नहीं जानते कि मेरे सामने अपने समय के अपने विषयों के विशेषज्ञ बैठे हैं। उनमें कोई विज्ञानिक होगा। कोई बड़ा फलास्फर होगा। कोई दक्ष शिक्षक होगा और कोई बड़ा चिकत्सक तो कोई बड़ा इंजीनियर। कोई किसी चीज का आविष्कारक होगा। जिस से मानव जीवन को लाभ होगा। उस समय शायद मैं जीवित न रहूं कि उनका सम्मान कर सकूं। इसलिये मैं आज ही उनका सम्मान कर लेता हूँ।

इस कहानी में सामने की बात यह है कि अपने विद्यार्थियों का सम्मान किया जाए ताकि हम उन्हें दूसरों का सम्मान करना सिखाएं। जब वे दूसरों का सम्मान करेंगे तो हमारा भी सम्मान करेंगे और स्वयं अपना सम्मान करना भी सीख जाएंगे। क्योंकि कोई व्यक्ति अपना सम्मान किये बिना समाज में सम्मानित व्यक्ति के रूप में अपनी जगह नहीं बना सकता। यह हमारे लिए भी गर्व की बात होगी कि हमारा विद्यार्थी समाज और देश का प्रतिष्ठित नागरिक है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि शिक्षक के सामने लक्ष्य क्या था? वह अपने बच्चों को बनाना क्या चाहता था? और वास्तव में वह जो चाहता था और जिस का वह प्रयास भी करता था वही अपने बच्चों में समय से पूर्व देखता भी था। वह अपने जिस बच्चे में जो गुण देखता था उसको वह मर्तबा भी देता था। ऐसा इसलिये था कि वे अपने प्रयासों से संतुष्ट था, उसने अपनी गलतियों पर काबू पालिया था और निरंतर प्रयासों से अपने काम में दक्ष हो चुका था। अब वह हर छात्र की छिपी क्षमताओं का सही आकलन कर लेता था और उसी के अनुसार उस पर मेहनत करता था। उसे विश्वास था कि वह जो बनाना चाहता है वह बनेगा ही।

जब तक हम अपने बच्चों के प्रति उच्च लक्ष्य निर्धारित नहीं करेंगे तब तक बड़े या अच्छे परिणाम की आशा कैसे की जासकती है? अगर हम अभी से अपने बच्चों से निराश होंगे तो कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे छात्र अपने विषय के विशेषज्ञ होंगे। जब हम किसी वृक्ष से निराश हो जाते हैं तो उसमें पानी देना छोड़ देते हैं। जब जड़ ही सूख जाएगी तो उसकी शाखाएं कहाँ हरी होंगी। हम अपने बच्चों से कभी निराश न हों। हम निराश हो जाएंगे तो उसका दिल पराजित हो जाएगा और फिर वह कहाँ से सफल हो पाएगा।

प्रायः देखा जाता है कि बच्चों के अंदर उबलती हुई बल-शक्ति उसकी रचनात्मकता से मिलकर जब कोई सकारात्मक रूप धारण नहीं करती है तो नित-नई शरारतों में तब्दील हो जाती है। शिक्षक उससे झिल्ला जाता है और भविष्य में इसकी विफलता का अंतिम फैसला दे देता है। कभी हमने सोचा कि इससे क्या हो सकता है? इस से छात्र के भीतर अपनी कमी के संदेह का आधार पड़ जाता है। उसका हौसला पस्त हो जाता है। उसमें आत्मविश्वास की कमी आजाती है और वह पौधा जो घना एवं मजबूत और तनावर  होने की क्षमता रखता था शुरुआत में ही सूख जाता है। हम उन्हें शरारत से जरूर बचाएं लेकिन हम उसको प्रोत्साहित करें कि वह अपनी बल-शक्ति और रचनात्मकता के सकारात्मक उपयोग से कोई नया काम करे। यह सकारात्मक उपयोग उच्च उद्देश्य को पाने के लक्ष्य के साथ सामने लाया जा सकता है।

हमने देखा होगा कि कुम्हार की चाक पर कभी कभी कुछ मिट्टी बेकाबू होती रहती है। कुम्हार उन्हें उठाकर फेंक नहीं देता बल्कि वह निरंतर उसे काबू मे लाकर प्रस्तावित रूप देने का प्रयास करता रहता है। इसके बाद भी अगर वह मिट्टी वह नहीं बन पाती जो कुम्हार चाहता था तब भी कुछ न कुछ बन ही जाती है। छात्रों में भी हमें यह अनुभव होगा और कुम्हार से अधिक होगा। क्योंकि कुम्हार के सामने बेजान वस्तु है जिसमें कोई इच्छा नहीं हैं जबकि हमारे सामने जावित और अपने अनूठे लक्षण एवं इच्छा शक्ति रखने वाली हस्ती मौजूद है जिसे हम से कोई सीख लेने से अधिक अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता प्रिय है। ऐसी स्थिति के बावजूद हमें उन्हें कुछ बनाने का लक्ष्य रखने का लगातार प्रयास करते रहना है। ताकि वे वह न बन सकें जिसका प्रयास किया गया है तब भी कुछ तो बन ही जाएं।

इसलिये जरूरी है कि हम अपने बच्चों के लिए उच्च लक्ष्य निर्धारित करें। लक्ष्य तब निर्धारित होगा जब हमारे मन में यह विचार हो कि अपने पेशे से केवल रोटी नहीं कमानी है बल्कि हमारे हाथ में जो कच्चा या खाम माल है उस से कोई नई और अनोखी चीज बनानी है जो मेरे मरने के बाद मेरी निशानी होगी। लेकिन इसकी प्राप्ति तभी होगी जब हम खुद को इन्हीं बच्चों में गुम करदें। हम समझें कि बेहतर परिणाम हमारी महनतों का फल है। लेकिन इस के साथ हमें माहिर बनना होगा और माहिर बनने के लिए आवश्यक है कि हमें अपनी कमियों का एहसास हो। जब तक हम अपनी कमियों का एहसास नहीं करेंगे तब तक हम अपनी गलतियों में सुधार नहीं ला सकते हैं और जब तक गलतियों में सुधार नहीं होगा हम माहिर नहीं हो सकते।

अपनी कमियों को दूर करने के लिए हमको अपने काम की समीक्षा करनी होगी। जब एक वर्ग से निकल कर दूसरे वर्ग में प्रवेश कर रहे हों इस समय को मानसिक आराम में बिताने के बजाय अपनी समीक्षा करें कि हमने वर्ग में कहां चूक की। या यदि हमारी याददाश्त कमजोर न हो तो हम ऐसा भी कर सकते हैं कि जब स्कूल से घर चले जाएं या जब स्कूल के काम से फुर्सत मिल गई हो तो उस समय हम पूरे दिन के कार्य की समीक्षा करें। हम महसूस करेंगे कि कौन सा काम कैसे करते तो ज्यादा बेहतर परिणाम सामने आता। जब हम समीक्षा करेंगे तो हमें अपनी कमियों का एहसास होगा। कमियों का एहसास खामियों को दूर करेगा और खामियों की दूरी हमें माहिर बनादेगी तो देर मत करें और माहिर बन जाएं। अच्छा उत्पाद तैयार करें और अपने मन को संतुष्ट करें और जब दुनिया से जाएं तो इस संतोष के साथ कि हमारे ज़िम्मे जो काम दिया गया था उसे हम ने पूरा किया।

शिक्षक बंधूओ! समीक्षा के लिए समय, दिन और तारीख़ कोई मायने नहीं रखते जब एहसास होजाए रुख बदलने के लिए वही समय शुभ है। इसके बावजूद आज जब हमारा सम्मान हो रहा है अपनी जिम्मेदारियों के प्रति समीक्षा का अच्छा अवसर है। इसलिये हमें समीक्षा करना चाहिए और जब हमें एहसास हो जाएगा तो व्यवहार में परिवर्तन बहुत आसान होगा तो समीक्षा करें और अपने व्यवहार में परिवर्तन ले आएं।

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रा0. बनियादी विद्यालय मझौलिया, दरभंगा

 

Sunday, 17 January 2021

تاکہ سند رہے

 

تاکہ سند رہے

                                                                                                                                                                                احتشام الحق

۱۷؍ جنوری ۲۰۲۱ کے روزنامہ  پندار کے شمارے میں گوشۂ ادب کے صفحے پر عارف حسن وسطوی کا ایک مضمون ‘‘منصور خوشتر : نئی صبح کا استعارہ – ایک مطالعہ ’’ نظر نواز ہوا ہے۔ اس مضمون میں انہوں نے جواں سال ادیب و شاعر ڈاکٹر کامران غنی صبا کی مرتبہ کتاب ‘‘منصور خوشتر : نئی صبح کا استعارہ’’ کے حوالے سے  مبسوط تبصرہ پیش کیا ہے۔ اس میں انہوں نے جن خیالات کا اظہار کیا ہے  ان میں بیشتر سے قطع کلام کرتے ہوئے  میرا خیال ہے کہ ایک جگہ  پر شدید اختلاف کی گنجائش موجود ہے اور جس کی وضاحت بھی ضروری ہے تاکہ سند رہے۔ عارف حسن  نے مضمون میں لکھا ہے :

‘‘مجھے لکھنے میں کوئی قباحت نہیں کہ منصور خوشتر جیسے نوجوان کے دم خم سے دربھنگہ شہر بھی ایک دبستان کی شکل اختیار کرچکا ہے۔ ’’

اس جملے میں عارف حسن وسطوی نے ‘‘کوئی قباحت نہیں ’’ کا  فقرہ  استعمال نہیں کیا ہوتا تو  کہا جاسکتا تھا کہ مضمون نگار نے غیر ارادی طور پر لکھ دیا ہے۔ لیکن کوئی قباحت نہیں کا فقرہ یہ بتاتا ہے انہوں نے پوری سنجیدگی کے ساتھ یہ دعوی کیا ہے۔ حالانکہ مجھے اب بھی یقین ہے کہ عارف حسن وسطوی نے سنجیدگی کے ساتھ یہ جملہ نہیں لکھا ہے۔

اس   جملے میں دو باتیں  یا دو دعوے کیے گئے ہیں۔ ایک ‘‘منصور خوشتر کے دم خم سے ’’اور دوسرا  ‘‘دربھنگہ شہر بھی دبستان کی شکل اختیار کر چکا ہے’’۔ یہ دونوں دعوے قابل گرفت ہیں۔ جہاں تک دربھنگہ کے دبستان ہونے کی بات ہے تو یہ واضح رہنا چاہیے کہ دربھنگہ کو بہت عرصے سے ماہرین کے ذریعہ  ایک دبستان کی شکل کے طور پر تسلیم کیا جاتا رہا ہے۔ فی الحال میرے ذہن میں اس کا  حوالہ مستحضر نہیں ہے جس میں اس کا ذکر ہے۔ لیکن جہاں تک میرا حافظہ کام کرتا ہے میں نے کئی جگہوں پر ماہرین کی ایسی رائے دیکھی ہے اور  یہ حقیقت بھی ہے۔ کیونکہ  دربھنگہ میں ہر عہد  میں ایسے ادبا اور شعرا موجود  رہے ہیں جن کی ادبی حیثیت قومی سطح پر مسلم رہی ہے۔یہ اور بات کہ دربھنگہ کو ایک دبستان کا نام تو دے دیا گیا لیکن اس کے ادبی خط و خال پر بحث نہیں کی گئی جو اس کو دبستان کی حیثیت سے ممتاز کرتے ہیں۔ اس طور پر  یہ کہا جاسکتا ہے کہ دربھنگہ کی دبستانی حیثیت دبستان عظیم آباد کی ذیلی شاخ کے طور پر  قائم رہی ہے اور اس کی وجہ یہ ہے کہ دبستان کو ایک مرکز کی حیثیت حاصل تھی۔

دربھنگہ سے اٹھنے والے  ادیب وشعرا اور دربھنگہ میں شعر وادب کی آبیاری کرنے والوں میں کئی نام بڑے اہم اور معتبر ہیں۔ ان میں  زیب النساء مخفی بنت اورنگزیب کے استاد ملا ابو الحسن  ہیں۔ اگر آپ دیکھیں تو مظہر امام کا تعلق دربھنگہ ہی سے تھا جن کو آزاد غزل کا بانی قرار دیا گیا ہے۔ خاندان مغلیہ کے ایک شہزادہ مہاراجا لکشمیشور سنگھ کے مصاحب  تھےجو مرزا زبیر بخش عرف زبیر گورگانی  کے نام سے جانے جاتے ہیں ۔  ان کے دیوان کا نام چمنستان سخن ہے۔  دربھنگہ میں بھیکا شاہ سالانی کے احاطہ میں ان کا مقبرہ ہے۔ شیخ احمد بن شیخ ابو سعید معروف بہ ملا جیون صاحب نور الانور (  گورنر کی حیثیت دربھنگہ میں مامور تھے۔ )، ابو الخیر مظہر عالم خیر رحمانی کا تعلق دربھنگہ سے تھا جو صاحب دیوان شاعر ہیں اور ان کے تین دیوان موجود ہیں۔ یہ ماہنامہ الپنچ کے مدیر بھی تھے۔ شاد عظیم آبادی جیسے شاعر سے ان کی ادبی معرکہ آرائی رہی۔

ان کے علاوہ بھی  آپ نظر ڈالیں کہ الگ الگ وقتوں میں کیسی کیسی ادبی ہستیاں یہاں موجود رہی ہیں تو آپ کو اندازہ ہوجائے گا کہ دربھنگہ کی دبستانی حیثیت کا ماضی میں بھی انکار نہیں کیا جاسکتا ہے۔

طہٰ الہی فکر، محسن دربھنگوی، شاداں فاروقی، عاقل رحمانی، صوفی عبد الرحمن، حافظ عبد الخالق جوہر،  ڈاکٹر سید عبد الحفیظ سلفی، شبنم کمالی، اویس احمد دوراں، احسان دربھنگوی، مجاز نوری، حسن امام درد، پروفیسر منصور عمر ، پروفیسر لطف الرحمن،  مولانا عبد العلیم آسی، نور الہدی نور اصلاحی، مولانا قمر اصلاحی (مدیر پروانہ) ، منظر شہاب، نواب سید سعادت علی خاں، ظہیر ناشاد وغیرہ چند ایسے نام ہیں جو ذہن میں آگئے ہیں۔ یہ چند نمایاں نام ہیں اور یہ عہد وار بھی نہیں ہیں۔ جیسے جیسے ذہن میں نام آتے گئے ہیں  لکھ دئے گئے  ہیں۔ انہی حضرات کے دور میں دیگر شعرا و ادبا بھی موجود تھے اور استادانہ حیثیت کے مالک تھے۔  اس کا تفصیلی مطالعہ کیا جاسکتا ہے۔

موجود ہ  دور میں بھی اگر آپ دیکھیں جہاں پروفیسر عبد المنان طرزی جیسی شخصیت موجود ہے جو نہ صرف اردو زبان بلکہ فارسی شاعری پر بھی دسترس رکھتے ہیں  اور اس کے لیے انہیں صدر ایوارڈ بھی ملا ہوا ہے۔ جدید شعرا میں جمال اویسی بھی قومی سطح پر شناخت رکھتے ہیں اور ان کی شاعری اعلیٰ ادبی معیار پر کھری اترتی ہے۔ موجودہ عہد میں عطا عابدی کی شاعری  بھی  منفرد شناخت رکھتی ہے۔ استاد الشعرا رہبر چندن پٹوی، ڈاکٹر امام اعظم، ڈاکٹر مشتاق احمد، خالد عبادی کے علاوہ ایسے کئی اہم شعر ا ہیں جن کی ادبی حیثیت کا چنداں انکار نہیں کیا جاسکتا ہے۔ موجودہ عہد میں جو شعرا موجود ہیں ان میں کئی استادانہ حیثیت کے مالک ہیں۔ ان کے علاوہ کچھ اور بھی ایسی شخصیتیں موجود ہیں  جو دربھنگہ سے تعلق رکھتی ہیں۔ ا گرچہ ان کا دائرہ عمل اس وقت دربھنگہ یا بہار نہیں ہے۔

شاعری کے علاوہ فکشن، ڈراما نگاری، حالیہ ،  تنقید، تحقیق، صحافت اور دیگر اصناف کے حوالے سے بھی ماضی سے تا ہنوز کئی معتبر نام ہیں جن کا تعلق دربھنگہ سے رہا ہے اور دربھنگہ دبستانی حیثیت کو سازگار بنانے میں ان کی خدمات بڑی اہم اور ناقابل فراموش ہیں۔

Sunday, 26 May 2019

کیا تعلیم ریاست کی ترجیح میں سر فہرست نہیں ہے



کیا تعلیم ریاست کی ترجیح میں سر فہرست نہیں ہے؟؟؟
گزشتہ دن معزز سپریم کورٹ نے بہار کے کانٹریکٹ ٹیچروں  کو مساوی کام کے بدلے مساوی تنخواہ کے مقدمہ کی سماعت کرتے ہوئے پٹنہ ہائی کورٹ کے ذریعہ جاری فیصلہ کو مسترد  کردیا جس میں کہا گیا تھا  کہ بہار کے ساڑھے چار لاکھ کانٹریکٹ اساتذہ کو مساوی کام کے بدلے مساوی تنخواہ  حکومت کو دینا ہوگا۔ معزز سپریم کورٹ نے یہ  فیصلہ سنایا کہ بہار کے پرائمری سے لے کر ہائر سکینڈری اسکولوں میں کام کر رہے کانٹریکٹ پر بحال اور اب مستقل اساتذہ کے مقابلہ  میں کم شرح تنخواہ پا رہے اساتذہ کو مساوی کام کے بدلے میں مساوی تنخواہ نہیں دی جاسکتی ہے۔ اس کی جو وجہ بتائی گئی ہے بنیادی طور پر  وہ حکومت بہار کے پاس مالی وسائل کی کمی ہے۔ ممکن ہے ایسا ہو۔ مجھے سپریم کورٹ کے فیصلہ پر کوئی اعتراض نہیں ہے۔ دوسری جانب حکومت کی جانب سے کہا گیا ہے کہ  ان اسکولوں میں پہلے سے کام کر رہے جو مستقل اساتذہ  ہیں انہیں ڈائنگ کیڈر میں ڈال دیا جائے گا اور اب پہلے سے دی جا رہی شرح تنخواہ پر اساتذہ کی بحالی نہیں ہوگی۔ ظاہر ہے کہ حکومت کے پاس  کچھ ایسے اختیارات ہیں کہ وہ کسی طرح کا فیصلہ کرسکتی ہے۔ اس طرح کے فیصلے جمہوری ملک میں بڑے اٹ پٹے سے لگتے ہیں لیکن ہمیں زمینی حقیقت کے طور پر یہ سمجھنا چاہیے کہ گرچہ حکومت کی تشکیل یہاں جمہوری طریقہ سے ہوتی ہے لیکن حکومت چلانے والے لوگ ہمیشہ ڈکٹیٹر شپ سے کام لیتے ہیں۔ زیر نظر فیصلہ میں حکومت کے ڈکٹیٹر شپ کے رویہ کا انکار نہیں کیا جاسکتا ہے ۔
مالی وسائل کی کمی اپنی جگہ لیکن اس فیصلہ کا ایک دوسرا پہلو بھی ہے جس کی طرف حکومت، اپوزیشن پارٹیوں ، ماہرین تعلیم اور ملک کے دانشور طبقات کا  توجہ دینا بہت ضروری ہے۔ مالی وسائل کی کمی کے مسائل کے ساتھ ساتھ اگر اس طرف توجہ نہیں دی گئی تو ریاست کو ایک بڑے نقصان کا سامنا کرنا پڑے گا۔ یہ  دوسرا پہلو یہ ہے کہ  حکومت کی ترجیح میں بنیادی تعلیم  کی حیثیت کیا ہے؟ کیا تعلیم حکومت کی ترجیح میں سرفہرست نہیں ہے؟ اگر نہیں ہے تو کیوں نہیں ہے اور کیا اس کا کوئی اثر سماج اور ریاست پر مرتب نہیں ہوگا؟ ملک کے غریب بچے کیا معیاری تعلیم کے حق سے محروم کر دئیے جائیں گے۔
 ایک بات بہت واضح طور پر سمجھی جاسکتی ہے کہ جب حکومت اچھی شرح تنخواہ پر اساتذہ کی تقرری بند کر دے گی تو اچھے اور قابل لوگوں کی ترجیح بھی تعلیم کے شعبہ میں ملازمت کے لیے نہیں رہ جائے گی۔ کیونکہ ہر آدمی اپنی صلاحیت کے مطابق اس شعبہ کا انتخاب کرتا ہے جہاں اس کی امیدیں اور ضروریات پوری ہوسکیں۔ اس میں کوئی شبہ نہیں کہ اس زمانہ میں  اور ہر زمانہ میں ہر شخص اپنی صلاحیت کے مطابق بہتر سے روز گار حاصل کرنا چاہتا ہے جہاں اسے اچھی تنخواہ اور اچھی سہولیات میسر ہوسکیں تاکہ اس کے معیار زندگی میں بہتری آسکے۔ مثال کے طور پر ہندوستان میں سول سروسیز میں لوگوں کو اس کی صلاحیت کے مطابق اچھی تنخواہ اور اچھی سہولیات اور اچھی عزت ملتی ہے تو جو سب سے کریم بچے ہوتے ہیں وہ اس شعبہ کا انتخاب کرتے ہیں۔ اگر مان لیا جائے کہ سول سروسیز میں موجودہ تنخواہ اور وہ عمدہ سہولیات ختم ہوجائیں جو موجودہ وقت میں دی جا رہی ہیں تو لوگ اپنی لیاقت اور کام کی  صلاحیت کے مطابق کسی اور شعبہ کی تلاش کریں گے۔
تعلیم کے شعبہ کی طرف بھی لوگوں کا رجحان اسی لیے رہا ہے کہ یہاں اس کی صلاحیت کے مطابق مناسب شرح تنخواہ، دیگر سہولیات اور عزت مل سکے۔ لیکن جب حکومت نے یہ چیزیں ختم کردی ہیں تو اس کا سیدھا اثر یہ ہوگا کہ با صلاحیت افراد کا رجحان  شعبہ تعلیم کی طرف ختم ہوجائے گا۔ کیونکہ اس میں  ان کی  علمی لیاقت  اور کام کی صلاحیت کے مطابق ان کی امیدیں اور ضروریات پوری نہیں ہوسکتی ہیں۔ جب لوگوں کا رجحان اور بہاؤ اس شعبہ کی طرف ختم ہوجائے گا تو مجبورا حکومت کو افراد کی قلت کو کم کرنے کے لیے انہی افراد کا انتخاب  کرنا ہوگا جو دیگر شعبوں میں ہارے ہوئے ہوں گے۔ ظاہر ہے کہ ایسے افراد کے انتخاب سے عوامی تعلیم پر منفی اثرات مرتب ہوں گے۔ اس طرح ریاست سے تعلیم چوپٹ ہوجائے گی اور سرکاری اسکول حکومت کا محض ایک غیر مفید شعبہ بن کر رہ جائے گا اور حکومت اس پر جو پیسے بھی خرچ کرے گی وہ ضائع ہوں گے۔ ریاست کے غریب بچے جن کی تعلیم کا ایک واحد ذریعہ سرکاری اسکول ہے معیاری تعلیم سے محروم ہوجائیں گے۔ آج بہار جو ملک بھرمیں اپنی فطری صلاحیتوں کی وجہ سے شناخت رکھتا ہے اس میں کمی آجائے گی۔ معیاری تعلیم چند امیر گھرانوں تک محدود ہو کر رہ جائے گی۔ ساتھ ہی غریب بچوں کے درمیان جو اعلی ذہانت  موجود ہے وہ مناسب موقع نہیں ملنے کی وجہ سے کند ہوجائے گی اور ریاست معاشی وسائل کے ساتھ  ذہنی وسائل کے بحران کا بھی شکار ہوجائے گی۔
اب حکومت کو یہ فیصلہ کرنا ہے کہ تعلیم اس کی ترجیح کس حد تک شامل رہے گی  اور وہ ریاست میں کس طرح کی تعلیم دینا چاہتی ہے۔ حکومت بار بار جس کوالیٹی ایجوکیشن کی بات کرتی ہے کیا وہ ہارے ہوئے لوگوں اور ہارے جی کام کرنے والوں لوگوں سے حاصل کرسکے گی؟؟؟

Sunday, 28 October 2018

تاثرات

محکمہ راج بھاشا کی جانب سے منعقد ضلع فروغ اردو سمینار میں پیش کئے گئے میرے تاثرات
مسند صدارت پر فائز صدر ایوارڈ یافتہ شاعر پروفیسر عبد المنان طرزی صاحب
وقار مجلس اس ضلع کے ڈائنیمک اور فعال ڈی ایم ڈاکٹر چندر شیکھر سنگھ صاحب
زینت مجلس ایڈیشنل کلکٹر محمد مبین علی انصاری، ضلع ایجوکیشن افسر ڈاکٹر مہیش پرساد سنگھ، اس سمینار کے کنوینر ضلع اقلیتی فلاح افسر محمد وسیم احمد صاحبان ،استاذ گرامی پروفیسر انیس صدری صاحب ، یہاں موجود اردو زبان و ادب کے ماہ و نجوم، اس کے سپاہی اور حاضرین کرام!
محکمہ راج بھاشا کی ہدایت پر ضلع انتظامیہ کی سرپرستی اور محکمہ اقلیتی فلاح کی جانب سے منعقد اس سمینار میں آج اردو زبان کے فروغ میں حائل دشواریوں اور ان کے حل سے متعلق تبادلہ خیال کیا جا رہا ہے۔ اس خوبصورت سیمینار کے انعقاد کے لیے میں ضلع انتظامیہ اور منتظمین سیمینار کو مبارکباد پیش کرتا ہوں۔ اس سمینار میں اس خاکسار کو بھی اپنے تاثرات رکھنے کا موقع دیا اس کے لیے میں ان کا بے حد شکر گزار ہوں۔
حضرات!
ہم جانتے ہیں کوئی زبان حکومت کے سہارے ہرگز زندہ نہیں رہتی ہے لیکن اگر اسے سرکار کی سرپرستی حاصل ہو جائے تو اس کے پر لگ جاتے ہیں۔ اردو ہمارے ملک کی سب سے زیادہ بولی اور سمجھی جانے والی زبان ہے۔ یہ ہمارے سماج کی سب سے زیادہ رائج زبان ہے۔ وہ اردو زبان جو ہندوستانی اور ہندوی کے نام سے بھی جانی جاتی ہے کہہ لیجئے کہ اس ملک کی قومی زبان ہے۔ اس کی ایک چھوٹی سی مثال یہ ہے کہ میں اس وقت اردو میں بول رہا ہوں اور یہاں موجود ہندی بھاشی حضرات اس کو ٹرانسلیٹ کئے بغیر ہندی میں سمجھ رہے ہیں۔ یہ زبان بڑے پیمانے پر بولی اور سمجھی جاتی ہے اس کے باوجود لکھنے اور پڑھنے کی سطح پر محدود ہوتی جا رہی ہے۔ ایسے گھرانے جہاں اکا دکا اردو لکھنے پڑھنے والے موجود ہوتے تھے اب وہ بھی اردو لکھنے پڑھنے والوں سے خالی ہو چکے ہیں۔ کچھ نئے گھرانوں میں اردو ضرور پہنچی ہے لیکن خالی ہونے کی شرح پہنچ کی شرح سے تیز ہے۔
اردو جن کی مادری زبان ہے ان گھرانوں میں بھی لکھنے پڑھنے والے تیزی سے کم ہو رہے ہیں۔ نئی نسل کے بچے اردو رسم الخط سے نابلد ہوتے جا رہے ہیں۔ بعض تقریبات میں ایسے بچے دیوناگری یا رومن رسم الخط میں لکھ کر اپنی تقریر یا پروگرام پیش کرتے ہیں۔ اس کی وجہ یہ ہے کہ اردو داں طلبہ و طالبات مادری زبان ہونے کے باوجود تدریس میں اردو زبان کے ساتھ Second Language کا سلوک روا رکھتے ہیں۔ یہ سکینڈ لینگویج بھی ان کے مضامین کی ترجیحات میں سکینڈری ہوجاتی ہے۔ جو چیز سکینڈری ہوجاتی ہے اس کا نتیجہ کیا ہوگا اس کو یہاں بتانے کی ضرورت نہیں ہے۔
عمومی سطح پر بھی اردو زبان میں لکھنے پڑھنے کا عمل اب صرف زبان یا ادب کے موضوعات میں محصور ہوتا جا رہا ہے۔ دیگر موضوعات کا علمی کام اب ختم ہو تا جا رہا ہے۔ ظاہر ہے اس کا ذمہ دار ہم حکومت کو تو نہیں ٹھہراسکتے ہیں۔    

کسی زبان کے فروغ کے لیے حکومت کی جانب سے جنتی مراعات ملنی چاہیے ہوسکتا ہے اردو کو وہ حاصل نہ ہوں۔ لیکن ہمیں دیکھنے کی ضرورت یہ ہے کہ ہمیں جو مراعات حاصل ہیں ہم ان کا استعمال کس حد تک کر رہے ہیں۔ اکنامکس کے اصولوں کو مد نظر رکھ کر بات کی جائے تو کہا جاسکتا ہے کہ بازار میں ڈیمانڈ کے مطابق ہی کسی چیز کی سپلائی ہوتی ہے۔ کسی چیز کی سپلائی اگر ڈیمانڈ سے زیادہ ہوجائے تو وہ بے وقعت ہو کر رہ جاتی ہے۔ اس لیے سپلائی روک دی جاتی ہے یا کم کردی جاتی ہے۔ ہمیں اگر حکومت سے مزید مراعات چاہئیں تو ہمیں اپنی یوٹیلائیزیشن کے ذریعہ ڈیمانڈ اتنی بڑھانی ہوگی کہ حکومت کے سامنے کرائسس دکھائی دینے لگے۔اور کرائسس کو بہت دنوں تک چھوڑا نہیں جاسکتا ہے کیونکہ ا س سے اشتعال پیدا ہوتا ہے۔ حکومت ڈانوا ڈول ہوجاتی ہے۔  
میں یہاں ایک بات اور کہتا چلوں کہ روز مرہ کے بہت سے کام ہیں جہاں اردو موجود ہے۔ کیا ہم وہاں اردو کا استعمال کرتے ہیں۔ایس بی آئی نے کئی اے ٹی ایم میں اردو میں فنکشن فراہم کردیا ہے جس کا پہلا اسٹپ پورا کرنے پر انسٹرکشن بنگلہ میں آتا ہے۔ اگر اس اسٹپ کو کسی طرح پورا کرلیں تو پھر اردو آجاتی ہے۔ ایچ پی گیس نے اپنے سائٹ پر اردو میں سہولت فراہم کرائی ہے۔ اس طرح کی روز مرہ کے بہت سے استعمال ہیں جہاں اردو موجود ہے۔ ہم اپنی ذاتی زندگی میں جہاں تیزی سے لکھنا ہو تو دیوناگری میں لکھنے لگتے ہیں۔ کیا اس کی ذمہ دار بھی حکومت ہے؟
انتظامیہ کی سطح پر اردو مترجم موجود ہیں ہم اردو الے ان سے کام نہیں لیتے ۔ ایسا نہیں ہے کہ سرکاری دفاتر میں اردو میں کام نہیں ہوتا ہے۔ میں نے چند برسوں قبل اردو میں آر ٹی آئی کی اس کا جواب ملا۔ ڈی ایم کمار روی صاحب کو میں نے اردو میں درخواست دی اور انہوں نے اسی وقت اس پر کارروائی کی۔ در اصل ہم حکومت کو مورد الزام ٹھہرا کر اپنے لیے فرار کی راہ تلاش کرتے ہیں۔  
باتیں بہت سی ہیں لیکن وقت کی نزاکت کو دیکھتے ہوئے میں مختصر طور پر صرف یہ عرض کرنا چاہتا ہوں کہ ضلع میں سیکڑوں کی تعداد میں اردو میڈیم اسکول موجود ہیں۔ ایسے بہت سے اسکول جہاں اب ایک بھی اردو استاد نہیں ہے۔ اردو میڈیم اسکولوں میں اردو داں اساتذہ موجود نہیں ہونے کے سبب ایسے اسکولوں کا میڈیم ہندی ہوگیا ہے۔ ایسے اسکولوں میں اردو اساتذہ یقینی طور پر بحال کئے جائیں۔ ایسی ہدایت دی جائے کہ جو اسکول اردو میڈیم ہیں ان میں درس وتدریس کا کام اردو میڈیم میں ہو۔  
اردو بہار کی دوسری سرکاری زبان ہے۔ اس حیثیت سے ہونا تو یہ چاہیے کہ ریاست کے تمام اسکولوں میں کم از کم اسکول کا نام اردومیں بھی لکھا جائے لیکن بد نصیبی یہ ہے کہ ایسے درجنوں اردو میڈیم اسکول ہیں جن پر اس کا نام اردو میں لکھا ہوا نہیں ہے۔ ڈی ایم صاحب سے گزارش یہ ہے کہ وہ اسکولوں کو یہ ہدایت جاری کر دیں کہ تمام اسکولوں پر عمومی طور پر اور اردو اسکولوں پر خصوصی طور پر اردو زبان میں بھی نام لکھا جائے۔
اس کے علاوہ ضلع کے تمام سرکاری دفاتر پر اردو میں نام لازمی طور سے ہو۔ سڑکوں کے نام بھی دیوناگری کے ساتھ اردو میں بھی لکھے جائیں۔اس بات کی اگر گنجائش ہو تو محکمہ اقلیتی فلاح کی جانب سے اقلیتی اداروں کو جو لیٹر بھیجے جاتے ہیں وہ اردو زبان میں بھیجے جائیں۔ اقلیتی اداروں سے اقلیتی فلاح دفتر کو موصول ہونے والے مکتوبات اردو میں ہی حاصل کئے جائیں۔ 
محکمہ راج بھاشا نے جس طرح اپنے ملازمین کا ورکشاپ کرایا ہے ضرورت ہے کہ اردو اساتذہ کا بھی ورکشاپ منعقد کرایا جائے اور اس کو یہ بھروسہ دلایا جائے کہ آپ اردو کے فروغ کے لیے کام کریں جہاں دشواری ہوگی انتظامیہ ضابطے کے مطابق ان کی ہر ممکن مدد کرے گی۔ 
انہی چند باتوں کے ساتھ میں اپنی بات ختم کرتا ہوں اور ایک بار پر انتظامیہ کو اس سمینار کے انعقاد کے لیے مبارکباد دیتا ہوں ۔ 
شکریہ
احتشام الحق


Sunday, 21 October 2018

شاہد جمیل کی شاعری میں رنگوں کا آہنگ



شاہد جمیل کی شاعری میں رنگوں کا آہنگ
                شاہد جمیل ایسے کہنہ مشق اور قادر الکلام شاعر ہیں جنہوں نے اردو شاعری کی مختلف اصناف میں نہ صرف طبع آزمائی کی ہے بلکہ استادانہ مہارت اور کمال ہنر کا ثبوت بھی پیش کیا ہے۔ انہوں نے غزل، نظم، ماہیے، کہہ مکرنی اور دوہے بھی کہے ہیں اور بارہ ماسے کی طرز پر مہینوں کو عنوان بنا کر نظمیں کہی ہیں۔ان سب میں الگ شناخت قائم کرنے کی کوشش کی ہے جس کا ناقدین نے اعتراف کیا ہے۔
                شاہد جمیل کے کلام میں کئی چیزیں قاری کو اپنی طرف متوجہ کرتی ہیں ان میں سے ایک رنگوں کا استعمال بھی ہے۔ رنگ در اصل پینٹنگ یا مصوری کا ذریعہ ہے لیکن شاعری میں بھی رنگ کی اپنی اہمیت رہی ہے۔شعرا منظر کشی اور تصویر کشی کے لیے رنگوں کا استعمال کرتے رہے ہیں جسے پیکر تراشی اور محاکات وغیرہ کہا جاتا ہے۔ جو شعر پیکر تراشی کے عمل سے گزر تا ہے وہ قاری میں وجدان کی کیفیت پیدا کرتا ہے۔ شاعر کے لیے پیکر تراشی کے عمل کو رنگوں کاصحیح استعمال نہ صرف سہل بناتا ہے بلکہ پینٹ اور برش کے مقابلہ میں لفظوں سے بنائی جانے والی تصویر میں ابھار اور جان پید ا کردیتا ہے۔ رنگوں کے درست Combination سے جو Shadeبنتا ہے اور اس سے شاعر جو منظر کشی کرنا چاہتا ہے اس کی زندہ و سلامت تصویر قاری کے سامنے پھرنے لگتی ہے اور ذہن پر اس کا دیرپر اثر مرتسم ہوتا ہے۔
                شاہد جمیل نے بھی اپنے کلام میں رنگوں کے استعمال سے خیال کی منظر کشی اور تصویر کشی کے رنگ بھرنے کی جوکوشش کی ہے وہ کامیاب ہوتی نظر آتی ہے۔ اس کا اعتراف ماہرین نے بھی کیا ہے۔ ڈاکٹر مناظر عاشق لکھتے ہیں :
                ‘‘شاہد جمیل نئی اور منفرد آواز کے مالک ہیں۔ ہلکے اور گہرے رنگوں کی شاعری کی بنت کاری کا تانا بانا تیار کرنے کا فن انہیں آتا ہے۔
چند اشعار ملاحظہ ہوں:
سرمئی جسم، جاں سرمئی
درد کے سب جہاں سرمئی
....
بھنور میں قوسِ قزح
ہر ایک ساحل سیاہ
....

غم کو دونوں معتبر!
سرخ دل کہ داغ سرخ
....
گل پہ خزاں تھی تو کیا؟
باغ، شجر، آب سبز
دل کا کھنڈر زرد زرد
یاد کی محراب سبز
فلک سے پوچھئے آداب مقتل
شفق کی شام کا مطلب گلابی
تماشے دیکھنا پھر آسماں کے
سفیدی ہو رہی ہو جب گلابی
....
میں دل کی دھند پہ الحاد لکھ دوں
گلابی شب کا ہر مذہب گلابی
میں اک رات ہر رات بے خواب
تو اک خواب ہر دم سنہرا
....
تو ازل ہے یا ابد کچھ نہیں
آسماں! سب تیرے منظر نیلگوں
                مذکورہ اشعار جو یونہی جہاں تہاں سے اٹھا لئے گئے ہیں ان میں بھڑکیلے رنگ کے ساتھ اودے اور پھیکے رنگوں کا یہ امتزاج شاہد جمیل کی شاعری میں معنوی تہ داری پیدا کرتے ہیں اور ایک فکر اور بیان کے ظاہری سطح کے پیچھے احساس کا ایک سلسلہ اور در وبست ہے جو قاری کو دور تک لے جاتا نظر آتا ہے۔   
لہو کا سبز پرندہ! گماں کا سرخ آکاش
یقیں کے پاؤں میں زنجیرِ درد، جھوٹ کہ سچ؟
....
یاد سی چیز کوئی لا کے شفق پر رکھ دی
شام کو شام سے اس طرح جدا ہم نے کیا
....
سفید تو، میں سفید
ترے مرے دل سفید
....
                شاہدجمیل رنگوں کو علت اور معلول کے ساتھ اس طرح الٹ پھیر کرتے ہیں کہ قاری ایک نتیجہ تک ضرور پہنچتا ہے لیکن کسی ایک مقام پر ٹھہر کر نہیں رہ جاتا ہے بلکہ دیرتک سوچنے پر مجبور ہوتا ہے کہ شاعر ہم سے آخر کیا کہنا چاہتا ہے ؟ خود قاری زندگی کے کئی تجربات میں کھوجاتا ہے اور اس سے قبل اس کو اپنے تجربہ سے جو بصیرت ملی ہوتی ہے اس سے پرے بھی اس کی نظر جاتی ہے اور اس کی نظروں میں ایک نئی روشنی پھیل جاتی ہے۔ صبح سفید دھند لکی روشنی اس کے ذہن کو روشن ومنور کئے دیتی ہے۔
سفید خواب، خواب کی سحر سفید
دھنک ہوئی سیاہ، بحر و بر سفید
....
سرخ شب، چراغ سرخ
گل سیہ تھا، باغ سرغ
....
یوں نہیں لوٹی دعا
لب سیہ، فریاد زرد
دھار دار فکروں کا ایسے نمونے شاہد جمیل کی شاعری میں جا بجا نظر آتے ہیں۔
                شاہد جمیل نے مہینوں اور ان کے مخصوص اوصاف اور تاثیر سے ابھرنے والے احساسات کو بھی شاعری کا موضوع بنایا ہے۔ ایسے کلام میں بھی انہوں نے رنگوں کے امتزاج سے منفرد آہنگ پیدا کیا ہے جو محسوس کرنے کے قابل ہے۔
                شاہد جمیل کی شاعری میں رنگ کے آہنگ کے ساتھ ساتھ فکرکا آہنگ بھی بدرجہ اتم موجود ہے اور قاری کی توجہ مبذول کراتی ہے۔ عام طور پر غزلوں کے مقابلہ میں نظموں میں اس کی زیادہ گنجائش رہتی ہے ۔ شاہد جمیل کے یہاں بھی نظموں میں بڑی فکر انگیزی ہے اور وہ فکر کو فن کی سطح پر برتنے میں بھی مکمل کامیاب نظر آتے ہیں۔ ہر قوم اور ہر ملک میں نئے سال کو ایک نئے انداز میں دیکھنے اور خوشی کے پیام کے طور پر دیکھنے کی روایت رہی ہے۔ حالانکہ حقیقت یہ ہے کہ انسان کی زندگی کا ہر پل اور ہر لمحہ نیا ہے۔ اگر اس کی آنکھیں کھلی ہوں اور حوصلہ ہو تو ہر صبح نئی مسرت کا پیغام لاتا ہے۔ لیکن نیا سال یا نیا دن اسی کے لیے نئی امیدووں کا پیغام بنتا ہے جو خود کو حالات کے دھارے کو موڑنے کا ہنر اور حوصلہ رکھتا ہو۔ شاہد جمیل نے بھی اپنی طویل نظم نیا سال میں ان تمام امیدوں کو پیش کیا جاتا ہے جو نئے سال سے وابستہ کی جاتی ہیں۔ انہوں نے بڑی خوبصورتی سے نئے سال پر امیدوں کی ابتدا کا آغاز کیا ہے اور انسان کے دل میں جس طرح کے جذبات پیدا ہوتے ہوں ان سب کو شاعری کے رنگ میں پیش کرتے ہوئے جو نتیجہ پیش کیا ہے وہ قاری کو چونکاتا اور سوچنے پر مجبور کرتا ہے۔
ہم جس دن خود بدلیں گے
اس روز نیا سال آئے گا
                مجموعی طور پر شاہد جمیل کی شاعری میں عصری حسیت فنی ہنر مندی کے ساتھ جگہ بناتی ہے اور روایتوں کی امین ہونے کے ساتھ ساتھ اپنی ایک منفرد آواز اور منفرد شناخت بنانے میں کامیاب نظر آتی ہے۔
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آپ کی نظروں نے سمجھا پیار کے قابل مجھے


آپ کی نظروں نے سمجھا پیار کے قابل مجھے
معروف شاعر جناب عبد المنان طرزی نے اپنی تازہ کتاب ‘‘توشیحی نظمیں’’ کے ٹائٹل پیج کی پشت پر ‘‘عزیزان با لیاقت کی سعادت مندیاں ’’ کے عنوان سے اپنے بارے میں مختلف کتابوں میں شامل چار عزیزوں کی آرا کو شامل کیا ہے جن میں یہ خاکسار بھی شامل ہے۔ بقیہ تین شخصیات ڈاکٹر مجیر احمد آزاد، ڈاکٹر احسان عالم اور ڈاکٹر منصور خوشتر نے یقینی طور پر ادب میں اپنی شناخت بنانے میں کامیابی حاصل کی ہے لیکن اس خاکسار کی اس فہرست میں شمولیت  جناب طرزی کی محض اعلی ظرفی اور ذرہ نوازی ہے۔ یہ عزیزوں سے ان کی بے پناہ محبت اور شفقت عامہ کا ایک پہلو ہے ۔ ورنہ ‘‘چہ نسبت ایں خاک را’’ ۔
                اس میں کسی تامل کی گنجائش نہیں ہے کہ میری اس رائے سے ان کی شخصیت میں کوئی بھی  اضافہ نہیں ہوگا کیونکہ ان کی شخصیت ہندوستان ہی نہیں عالمی سطح پر کسی تعارف کی محتاج نہیں ہے۔ در اصل یہ اپنے عزیز کو شناخت عطا کرنے اور مقام اعتبار بخشنے کی ایک  سعی مشکور ہے۔
                حقیقت یہ ہے کہ پشت پر میری مشمولہ رائے ان کی شعری کائنات کا غیر مکمل اور نا کافی  تعارف ہے۔ کیونکہ  بڑا ادب اپنے اندر اتنی وسعت اور تنوع رکھتا ہے کہ چند لفظوں میں اس کا احاطہ ناممکن ہوتا ہے۔ ایک پہلو کو سامنے لائیں تو دوسرا ہاتھ سے نکل جاتا ہے۔ جس طرح غلہ کے ڈھیر میں ہاتھ ڈال کر اٹھاتے ہیں تو مٹھی میں کچھ ہی دانے آتے ہیں اور ان میں سے بھی پھسل پھسل کر گرتے رہتے ہیں۔ جناب طرزی کی ادبی کہکشاں بھی کچھ ایسی ہی وسعت کی حامل  ہے  کہ اس کو سمیٹنے کی کوشش کریں تو الفاظ کی تنگ دامانی راستہ روک لیتی ہے اور کلام کی قدرت بیان کی عاجزی کا اظہار کرنے لگتی ہے۔

Tuesday, 7 August 2018

زباں (اردو) کی ہے آبرو باقی انہی خرقہ پوشوں سے


زباں (اردو )کی ہے آبرو باقی انہی خرقہ پوشوں سے 
۵ اگست ۲۰۱۸ کو  دربھنگہ کے ڈان باسکو اسکول میں محکمہ کابینہ سکریٹریٹ اردو ڈائرکٹوریٹ کی جانب سے فروغ اردو سمینار کا انعقاد عمل میں آیا۔ مذکورہ سمینار میں بعض اسکالروں نے اظہار خیال کرتے ہوئے کہا کہ اردو کو زندہ رکھنے میں سب سے بڑا رول موجودہ دور میں مدارس اسلامیہ کا ہے۔ یقینا یہ ایک سچائی ہے جس کا انکار نہیں کیا جاسکتا ہے لیکن اسی کے ساتھ بعض اسکالر اور مدبرین کا یہ احساس تھا کہ یہ محض جذباتی پہلو ہے اور اردو کو فروغ دینے میں مدارس کا کردار ضرور رہا ہے لیکن آج نوے فیصد مدارس صرف فارم داخل کرنے اور بچوں کو امتحان فارم داخل کرانے کے لیے رہ گئے ہیں۔ انہیں تعلیم و تعلیم سے کوئی مطلب نہیں۔ ایسے مدبرین کے خیال میں بھی  کسی  حد تک سچائی ہے لیکن در اصل یہ اشتباہ ہندوستان کے مدارس کے نظام میں فرق نہیں کرنے کے سبب پیدا ہوا ہے۔ 
ہم جانتے ہیں ہندوستان میں دو طرح کے مدارس کا نظام رائج ہے۔ ایک مدرسہ نظامیہ کہلاتا ہے جس کا سلسلہ پورے ہندوستان میں پھیلا ہوا ہے اور دوسرا وفاقی یا ملحقہ ہے۔ جب ہم مدارس کے نظام تعلیم کی بات کرتے ہیں اور اردو کے فروغ میں مدارس کے کردار کی تعریف کرتے ہیں تو اس وقت اہل نظر کے سامنے وفاقی یا ملحقہ مدارس کی بجائے نظامیہ مدارس ہوتے ہیں۔ 
جن اسکالروں کا خیال ہے کہ مدارس  اردو کو فروغ دینے میں کلیدی کردار ادا کر رہے ہیں ان سے مراد وہی نظامیہ مدارس  ہیں۔ اسٹیٹ یونیورسٹی سے لے کر سینٹرل یونیورسٹی میں اردو شعبہ کی آبرو انہیں نظامیہ مدارس کے فارغین سے بچی ہوئی ہے۔ وہاں کے اچھے بچے یقینا انہی مدارس کے ہوتے ہیں۔ اردو زبان جس ش ق کی درستگی، صحیح تلفظ اور شستہ و رواں لہجہ کے  لیے  پہچانی جاتی ہے اس کے مثالی نمونے ان مدارس کے طلبہ اور اساتذہ کے یہاں عام ہیں۔ اس کو یوں بھی سمجھا جاسکتا ہے کہ ابتدائی ایام میں اردو کو انگلی پکڑانے میں جن صوفیا کی خدمات کا اعتراف کیا جاتا ہے ان صوفیا کے صفات سے آج بھی یہی خرقہ پوشان مدارس متصف ہیں۔ آج بھی ان اہل مدارس عوام سے مضبوط رکھتے ہیں اور اس رابطہ کا ذریعہ یہی اردو زبان بنتی ہے۔
دلچسپ بات یہ ہے کہ ان نظامیہ مدارس میں متوسطہ سے اعلی تعلیم تک کے مرحلہ میں نصاب میں بطور زبان اردو مضمون کی حیثیت سے شامل نہیں ہے۔ یہ صرف ذریعہ تعلیم ہے۔ یا پھر تمام خارجی مطالعہ کا ذریعہ ہے۔ لیکن یہ کم بڑی بات نہیں ہے کہ طالب علم پر ایک مضمون کے بوجھ کا اضافہ کئے بغیر زبان کی تعلیم کا وہ مقصد حاصل کرلیا جاتا ہے جو عصری اداروں میں  بطور مضمون پڑھاکر بھی نہیں حاصل ہوپاتا ہے۔


Friday, 27 July 2018

بہتر تعلیم کیلئے صرف خصوصی تربیت مسئلہ کا حل نہیں



بہتر تعلیم کیلئے صرف خصوصی  تربیت مسئلہ کا حل نہیں
جڑوں کو سوکھا رکھ کر شاخوں پر پانی چھڑکنے سے درخت شاداب نہیں ہوں گے

میڈیا میں آئی خبروں کے مطابق سرکاری اسکولوں میں زیر تعلیم ریاضی اور دیگر مضامین میں کمزور بچوں کو محکمہ کی جانب سے خصوصی تربیت دی جائے گی۔ اس کی ذمہ داری حکومت نے بہار ایجوکیشن پراجیکٹ کونسل کو دی ہے۔ حکومت کو یہ خیال اس لیے آیا ہے کہ وزیر اعلی کے مشیر اور چیف سکریٹری نے محکمہ تعلیم کے حکام کے ساتھ ملاقات کی تھی جس میں یہ معاملہ سامنے آیا کہ سرکاری اسکولوں میں زیر تعلیم درجہ اول تا درجہ پنجم کے طلبہ ریاضی کے عام سوالات بھی حل نہیں کرپاتے ہیں۔
                حکومت کی یہ سنجیدگی قابل ستائش ہے۔ اگر حکومت یہ کرنے میں کامیاب ہوجاتی ہے تو یقینا  سماج کے لیے بڑا کام ہوگا۔ لیکن ماضی میں کی  گئی اس طرح کی کوششوں کے مد نظر امکان یہ ہے کہ حکومت کی یہ کوشش  بھی ناکام ہوگی۔ کیونکہ یہ جڑوں میں پانی دینے کی بجائے شاخوں پر پانی دینے کا عمل ہوگا جس سے درخت شاداب نہیں ہوتے۔ اولا تو محکمہ کا یہ خیال کہ درجہ اول تا درجہ پنجم کے طلبہ ریاضی  کے عام سوالات حل نہیں کرپاتے گرچہ  صد فیصد درست ہے لیکن حقیقت یہ ہے کہ درجہ ہشتم تک ایسے طلبہ ہیں جو ریاضی ہی نہیں قومی و مادری زبان ہندی میں بھی اتنے کمزور پائے جاتے ہیں کہ اس کا بیان انتہائی تکلیف دہ ہے۔ حکومت جو خصوصی تربیت کا انتظام کرے گی اندازہ یہ ہے کہ اس کے  لیے اساتذہ کو یہ ذمہ داری دی جائے گی کہ وہ اسکول میں بچوں کی چھٹی ہوجانے کے بعد ایک گھنٹہ ایسے بچوں کو تربیت دیں۔ جو کاغذ پر تو ممکن ہے شاید عمل میں نہ آسکے۔ اگر یہ اساتذہ اتنے ذمہ اور ایماندار ہوتے کہ وہ بچوں کی تعلیمی ترقی اور پیش رفت کے لیے درجوں کے بعد انہیں ٹریننگ دینے کا اہتمام کریں تو خود کلاس میں ہی بچوں کو اتنی تعلیم ضرور دیتے کہ بیشتر بچوں کی تشفی درجہ میں ہوجائے اور کچھ بچے جو پیدائشی طور پر یا معاشی اور دیگر مسائل کے سبب کمزوریوں کے شکار ہیں محض ان کا مسئلہ رہ جاتا ہے۔ ایسے بچوں کو خصوصی تربیت کے ذریعہ درست کیا جاسکتا ہے۔ لیکن یہاں درجوں میں بیشتر کمزور ہوتے ہیں اور چند ایک اچھے ہوتے ہیں۔ یہ  بھی سچائی ہے کہ اساتذہ کی ایک بڑی تعداد کلاس کے تئیں سنجیدہ نہیں ہے اور اس کے چند اسباب بھی ہیں۔
                اسکولوں میں تعلیم کی بہتری کے لیے محکمہ کا پورا نظام موجود ہے لیکن جس طرح اساتذہ تعلیم کے تئیں غیر سنجیدہ ہیں اس سے کہیں زیادہ محکمہ کا نظام غیر سنجیدہ ہے بلکہ یہ کہنا بے جا نہ ہوگا کہ اساتذہ کو ذمہ دار ی سے راہ فرا ر اختیار کرنے میں محکمہ کی جانب سے حوصلہ افزائی بھی کی جاتی ہے۔ محکمہ کی جانب سے اکثر اسکولوں میں سی آر سی سی، بی آر پی ، بلاک ایجوکیشن افسر ، ضلع ایجوکیشن افسر اور ضلع پروگرام افسر کی جانب سے معائنہ ہوتا رہتا ہے۔ ستم ظریفی یہ ہے کہ معائنہ میں ایسے افسران درجہ میں نہیں جاتے یا جاتے بھی ہیں تو محض بچوں کا سر گننے اور حاضری رجسٹر میں بنائی گئی حاضری سے گنے ہوئے سر کا مقابلہ کرنے تاکہ سر شماری اور رجسٹر میں درج تعداد میں بڑا فرق پائے جانے پر اسکول کے  ہیڈ ماسٹر سے پیسے کی وصولی کو جائز ٹھہرایا جاسکے۔ ہونا تو یہ چاہیے کہ اسکولوں کا معائنہ کرنے والے ہر سطح کے افسران درجہ میں پہنچ کر بچوں سے سوال کرتے۔ آج ان کو کون سا سبق پڑھایا گیا ہے۔ محکمہ کی جانب سے جو کیلنڈر دستیاب کرایا گیا ہے اس کے مطابق پڑھائی ہوئی ہے یا نہیں؟جو سبق پڑھایا گیا ہے اس کا حق ادا ہو سکا  ہے یا نہیں؟  سبق اگر بہت پیچھے ہے تو اس کے اسباب کیا ہیں؟کون کون سے مضامین پڑھائے گئے اور روزانہ پڑھائے جا رہے ہیں اور جن مضامین کی پڑھائی نہیں ہو پارہی ہے اس کے اسباب کیا ہیں؟ کیا اساتذہ کی کمی سے ایسا  ہو رہا ہے یا پھر اساتذہ اپنی ذمہ داری کے تئیں لا پرواہ ہیںَ جن مضامین کی پڑھائی ہوچکی ہے اس میں بچوں کی معلومات کی سطح کیا ہے؟  جن مضامین کے اساتذہ کی کمی  ہے اس کا حل کیا ہے۔ اس سلسلہ میں محکمہ کو رپورٹ دی جانی چاہے کہ اساتذہ کی کمی کے سبب تعلیم کا کیا نقصان ہو رہا ہے۔ حقیقت یہ ہے کہ افسران کو ان سب سے کوئی مطلب نہیں ہوتا۔
                اسکولوں میں ناقص تعلیمی نظام  کی ایک بڑی وجہ اساتذہ کی غیر معمولی کمی ہے۔ اکثر اسکولوں میں ضرورت کے مطابق اساتذہ موجود نہیں ہیں۔ ایک ہی درجہ میں دو دو، تین تین سے پانچ پانچ کلاسوں کی تعلیم بھی دیکھنے کو مل جائے گی اور اسکولوں کی ایسی تعداد بھی ہر ضلع میں قابل لحاظ ہے۔  جہاں ایسا ہے وہاں بچوں کی تعلیمی پیش رفت کیا ہوگی اس  کو بتانے کی ضرورت نہیں ہے۔ اس کا ذمہ دار اساتذہ کو نہیں ٹھہرایا جاسکتا ہے۔ یہ حکومت کی ذمہ داری ہے کہ وہ اسکولوں کو ضرورت کے مطابق اساتذہ فراہم کرائے۔ اگر ایسے اسکولوں میں بچوں کی تعلیمی  ترقی کو یقینی بنانے کے لیے خصوصی کلاس کا اہتمام کر بھی دیا جائے تو اس کا نتیجہ صفر ہی ہوگا۔
                حکومت نے گزشتہ چند سالوں میں جو تقرری کی ہے اس میں درجہ ششم تا درجہ ہشتم میں اساتذہ کی تقرری میں مضمون کی شرط رکھی گئی  ہے۔ یہ بڑی  حد تک اچھی بات ہے۔ ہونا تو یہ چاہیے تھا کہ ہر اسکول میں تمام مضامین کے اساتذہ  کی لازمی طور پر تقرری ہوتی۔ بلکہ نظام تو ایسا ہونا چاہیے تھا کہ ہر سال اسکولوں سے سکبدوش ہونے والے اساتذہ کے مقابلہ میں مضامین کے مطابق تقرری ہر سال ایک روٹین کے مطابق ہوتی رہنی چاہیے تھی تاکہ طلبہ کا تعلیمی نقصان نہ ہو۔ لیکن یہاں تقرری صرف ایک انتخابی ایجنڈہ ہے۔ تقرری کا اشتہار جتنا ہوتا ہے تقرری اتنی نہیں ہوتی۔ ریلیف کے فنڈ کی طرح تقرری نامہ تقسیم کیا جاتا ہے پھر برسوں حکومت اور عوام کسی جانب سے ضرورت محسوس نہیں کی جاتی ہے۔ صرف ملازمت پانے والے امید کی نظروں سے دیکھتے رہتے ہیں۔  بڑی تعداد اسکولوں کی ایسی ہے جہاں تمام مضامین میں اساتذہ موجود نہیں ہیں۔ سماجی علوم کا استاذ ہے تو سائنس کا نہیں، ریاضی کا استاد ہے تو سماجی علوم کا نہیں۔ اسکولوں میں انگریزی، ہندی، اردو اور سنسکرت سمیت زبان کے اساتذہ کی بڑی کمی پائی جاتی ہے۔  حالت یہ ہوتی ہے کہ ایک استاذ کو بسا اوقات ایک ساتھ کئی درجوں پر نگرانی رکھنی ہوتی ہے۔ اس کے نتیجے تعلیم متاثر ہوتی ہے۔  ان سب کاذمہ  دار اساتذہ کو تو بالکل ٹھہرایا نہیں جاسکتا ہے۔ لیکن معاملہ یہ ہے کہ حکومت نے جان بوجھ کر عوام میں سرکاری اسکولوں کے اساتذہ کے سلسلہ میں گمراہی پیدا  کر کے ان کے خلاف بد ظنی پید ا کردی ہے تاکہ عوام کی نظر اصل مسائل کی طرف نہیں جاسکے۔ عوام محکمہ کی جانب سے ملنے والے چند پیسوں کے مالی مفاد( پوشاک، اسکالر شپ ، کتابوں اور انڈوں) میں کھوجاتے ہیں اور اسکول انتظامیہ سے دست و گریباں رہتے ہیں۔ حالانکہ ان چیزوں کی دستیابی میں تاخیر یا کمی کا ذمہ دار بھی محکمہ ہی ہوتا ہے لیکن عوام کی نظروں میں قصور وار اساتذہ اور اسکول انتظامیہ ہوتی ہے۔اپنے کام کے تئیں اساتذہ کے والہانہ لگاؤ میں کمی کی ایک وجہ  وقت پر ماہانہ تنخواہ کی عدم ادائیگی بھی ہے۔ گرچہ اس کی ذمہ دار حکومت ہے اور اس کے لیے بچوں کے ساتھ نا انصافی کرنا  ناروا ہے۔ اساتذہ کو اس سے یقینا بچنا چاہیے۔ لیکن انسانی ضروریات کی تکمیل میں رکاوٹ پر یکسوئی پیدا ہونا محال بھی ہے۔ اساتذہ کی یکسوئی میں کمی کی ایک اور بڑی وجہ اساتذہ سے غیر تدریسی کاموں کا لیا جانا ہے۔ درجہ اول تا درجہ ہشتم تک کے اسکولوں میں کوئی کلرک نہیں ہوتا ہے۔ یہ سارے کام اساتذہ کو کرنے ہوتے ہیں۔ مڈ ڈے میل کے علاوہ روزانہ کی مختلف طرح کی رپورٹوں کے علاوہ کھلے میں قضائے حاجت کرنے والوں کی تصویر کشی اور بیت الخلا کی گنتی جیسے گھناؤنے عمل اور وقفہ وقفہ پر ملنے والی غیر تدریسی ذمہ داریاں اس  پر مستزاد ہیں۔  
                اسکولوں میں بہتر تعلیم کے لیے ضروری ہے کہ عوام کی جانب سے بھی کچھ تعاون اساتذہ اور اسکول انتظامیہ کو ملے۔ الیکشن میں عوام کے جو مطالبات ہوتے ہیں یا حکومت عوام کے سامنے جو ایجنڈے پیش کرتی ہے اس میں بھی کبھی یہ شامل نہیں ہوتا کہ ہر اسکول میں ضرورت کے مطابق اساتذہ فراہم کرائے جائیں ۔ یہ صرف روزگار کی فراہمی کا مسئلہ نہیں ہے بلکہ بجلی، پانی، صحت اور سڑک جیسی بنیادی ضرورتوں کی طرح ایک ضرورت ہے کہ ان کے بچوں کی تعلیم کے لیے بھرپور اساتذہ بھی فراہم کرائے جائیں اور ان سے تدریسی کام لئے جائیں۔ حکومت اساتذہ کی ضروریات کا خیال رکھے تاکہ وہ یکسوئی کے ساتھ درس و تدریس میں منہمک ہوسکیں۔
                اگر حکومت کو اسکولوں میں بہتر نظام تعلیم کا ماحول فروغ دینا ہے تو اولا تو ضرورت کے مطابق اساتذہ بحال کرنے ہوں گے۔ اساتذہ کی بنیادی ضرورتوں کا خیال رکھنا ہوگا۔ان کو غیر تدریسی کاموں سے فارغ رکھنا ہوگا۔ اس بات کو یقنیی بنانا ہوگا کہ نگرانی اتھارٹی مالیات کی فراہمی کی بجائے تدریس کو یقینی بنائے۔ ورنہ یوں شاخوں پر پانی چھڑکے جاتے رہیں اور جڑیں سوکھی کی سوکھی ہی رہیں گی۔
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